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भारतीय जनजाती लेख श्रृंखला गद्दी जनजाति

भारतीय जनजाती लेख श्रृंखला गद्दी जनजाति

उत्तर भारत के पर्वतीय वनांचलों में बसने वाले समाज की बहुत बड़ी जनजाति है गद्दी, गुर्जर अथवा गड़रिया। इनकी सबसे अधिक आबादी हिमगिरि संभाग के धौलाधार पर्वतमाला, चम्बा की घाटी, भरमौर के पहाड़ी क्षेत्रों और धर्मशाला में विशेषकर बसी हुई है। ऐसा माना जाता है कि यह जनजाति बहुत पहले मध्य भारत, गुजरात और राजस्थान से, जहाँ धर्मान्तरण के लिये आमादा मुगलों का आतंक था, उससे बचने और अपनी आस्था को बनाये रखने के लिये वनांचलों में बस गई।

गद्दी लोग मूलतः हिन्दू हैं और भगवान शिव के उपासक हैं। प्रकृति के निकट रहने वाला यह समाज बहुत सादी जीवन शैली में विश्वास रखता है और अपनी परम्पराओं से जुड़ा हुआ है। संगीत एवं नृत्य के शौकीन गद्दी लोग मिंजार, भरमौर, जात्रा और सुई मेले में विशेष रुचि से भाग लेते हैं और शिवरात्रि को बहुत धूमधाम से मनाते हैं। इसके साथ-साथ होली, दशहरा, जन्माष्टमी आदि त्यौहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं।

अधिकतर गद्दी लोग शाकाहारी होते हैं और बकरी का दूध और दूध से बने पदार्थ ही उनके मुख्य भोजन होते हैं। पुराने समय से इस समाज में बाल-विवाह और बहुपत्नी-विवाह की परम्परा रही जो अब नये दौर की जागृति और बदलाव के साथ बदल रही है। सच्चाई, ईमानदारी, शांतिप्रियता, सामाजिक बन्धुता, व्यवहार कुशलता इनकी पहचान बन चुकी है और इसी कारण इस समाज में अपराध, हिंसा इत्यादि बहुत कम देखने को मिलती है।

गद्दी पुरुषों की पोशाक चोला, गरम ऊनी पायजामा, पगड़ी या साफा और महिलायें गरम ऊनी साड़ी धोरू या लाँचरी पहनती हंै। गर्म रंगीन शाल व दुपट्टा और गले में हार महिलाओं को बहुत पसंद हैं। महिलायें घर पर ही कपड़ा बुनती और बनाती हैं और विशेष त्यौहारों पर पहनती हैं। महिला और पुरुष दोनांे ही सोने के आभूषण विशेषकर कानों की बालियाँ पहने हुये देखे जाते हैं। गद्दी जनजाति की सामान्य बोलचाल की भाषा गुजरी, गोजरी है। प्राचीन लिखने की लिपि टाकरी अब लुप्तप्राय हो चुकी है और प्रधानतः देवनागरी ही लिखने पढ़ने की भाषा है। हिमाचली गुर्जर लोग अन्य भाषा जैसे पंजाबी, हिमाचली, उर्दू भी आसानी से बोल समझ लेते हैं।

इस जनजाति का मुख्य पेशा पशुपालन है उसमें भी प्रमुखतः भेड़, बकरी पालन। यही इनकी आजीविका के मुख्य आधार हैं।  इसके साथ-साथ ऊन तथा ऊन के बहुत रंगीन और आकर्षक गरम कपड़े जैसे शाल, कंबल, गलीचे, जैकेट, लम्बा ओवरकोट, पायजामा, टोपी इत्यादि बनाकर आजीविका चलाते हैं।  इस जनजाति की जीवन शैली अपने व्यवसाय के अनुरूप पहाड़ों और जंगलों में, जहाँ इनके पशुओं के लिये घास इत्यादि सुलभ होती है, उसी के अनुसार ढल गई है। अब कुछ क्षेत्रों में इस समुदाय ने अपने रहने के लिये स्थाई बसावट के इन्तजाम करने प्रारम्भ कर दिये हैं। मौसम के अनुसार सर्दियों में अपने पशुधन के साथ नीचे स्थानों पर आ जाते हैं, और गर्मियों में ऊँचे स्थान पर प्रवास करते हैं जहाँ भेड़ बकरियों के लिये घास के मैदान उपलब्ध होते हैं।

सामान्यतः शहरी समाज से दूर और घुमन्तू जीवन शैली के कारण उनके मध्य स्कूली शिक्षा न के बराबर रही। एकल अभियान गद्दी समाज के बीच बहुत लम्बे समय से पंचमुखी शिक्षा के माध्यम से कार्य कर रहा है। जिसके सुखद परिणाम प्राप्त हुये हैं। आज अच्छी संख्या में गद्दी बालक बालिकायें एकल विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा ले रहे हैं। वहाँ सत्संग संस्कार के कार्यक्रम लगातार आयोजित किये जाते हैं जिसमें बड़ी संख्या में वनबन्धु भाग लेते हैं।